<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-4527566775775163531</id><updated>2011-04-21T14:21:38.761-07:00</updated><title type='text'>भारतीय किसान</title><subtitle type='html'>FIRST BLOG OF INDIAN AGRICULTURE AND TECHNOLOGY ADVANCEMENT</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://kisanbhai.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4527566775775163531/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kisanbhai.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>कृष्ण कुमार कन्हैया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16176386032162944448</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_PkZfJrGs8Hk/SN3TArDWljI/AAAAAAAAAB4/V13eB3r7Iv4/S220/Sandeep+Singh+002.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>8</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4527566775775163531.post-1705088201713986718</id><published>2009-05-27T09:03:00.000-07:00</published><updated>2009-05-28T00:53:54.391-07:00</updated><title type='text'>आंवला की खेती</title><content type='html'>आंवला एक ऐसा औषधीय गुण वाला फल है, जिसकी मांग आयुर्वेद में हमेशा से रही है। आज के भाग दौड़ की जिंदगी में लोग एलोपैथिक दवाओं को छोड़ आयुर्वेदिक दवाओं से रोगों का इलाज़ कराने में बेहतरी समझते हैं। आंवला के सर्वोत्तम गुणकारी होने के कारण इसकी मांग भी बढ़ने लगी है। यही कारण है कि आज बड़ी बड़ी कंपनियों में इसकी मांग होने लगी है।जहां तक इसके औषधीय गुण की बात है तो इसमें विटामिन सी प्रचूर मात्रा में पाया जाता है।अपने इसी गुण के कारण इससे कई तरह की दवाईयां जैसे त्रिफला चूर्ण,चय्वनप्राश,ब्रम्हा रसायन मधुमेधा चूर्ण बनती है। इसके अलावा इससे बालों को लिए टॉनिक,शैंपू,चेहरे के लिए क्रीम,दंतमंजन आदि भी वनाये जाते हैं।&lt;br /&gt;औषधीय विशिष्ट लक्षण-स्कर्वी रोधी,मूत्रवर्धक,दात्तरोधी,जैविक रोधी और जिगर को पूष्ट बनाता है।&lt;br /&gt;इस लिए इसकी खेती में लाभ है। इसकी खासियत ये भी है कि इसे शुष्क प्रेदश में आसानी से उगाया जा सकता है।&lt;br /&gt;उपयुक्त भूमि-&lt;br /&gt;1-हल्की और मध्यम भारी मिट्टी&lt;br /&gt;       2-रेतीली मिट्टी में ना उगायें&lt;br /&gt;3-जिन प्रदेश में बारिस कम होती है वहां आसानी से उगाया जा सकता है।&lt;br /&gt;जलवायु-&lt;br /&gt;1-वार्षिक वर्षा-630 से 800 मि.ली. आदर्श&lt;br /&gt;2-नये पौधे को तीन साल तक मई जून में गरम हवाओं से बचायें&lt;br /&gt;3-सर्दी के मौसम में पाले से बचायें&lt;br /&gt;उन्नत किस्में-&lt;br /&gt;1-बनारसी&lt;br /&gt;2-चक्कैया&lt;br /&gt;3-फ्रांसिस&lt;br /&gt;4-कृष्णा&lt;br /&gt;5-कंचन&lt;br /&gt;6-भवानीसागर&lt;br /&gt;लागत&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्र।सं।    सामग्री                    प्रति एकड़       प्रति हेक्टेयर     &lt;br /&gt;1।      कलम की संख्यां               200           500   &lt;br /&gt;2।      फार्म यार्ड खाद (टन)            4             10    &lt;br /&gt;       रासायनिक खाद &lt;br /&gt;3।     नाईट्रोजन                           90            225  &lt;br /&gt;4।      फॉस्पोरस                        120            300   &lt;br /&gt;5।     पोटाश                                48             120    &lt;br /&gt;विशेष नोट-रोपण के पहले प्रत्येक गढ्ढे में 15 किलो ग्राम गोबर की खाद 500 ग्राम फॉस्फोरस डालना चाहिए। लगाये गए पौधे में 10 साल तक हर साल सितंबर अक्टूबर में नाईट्रोजन का व्यवहार जरूर करें।&lt;br /&gt;कृषि तकनीक-&lt;br /&gt;1-4.5x4.5 मी. की दूरी पर 1 मी. गहरा गढ्ढा मई जून में खोद लें।&lt;br /&gt;2-15 से 20 दिन के लिए धूप लगने दें।&lt;br /&gt;3-पौधे के रोपाई के पहले हर गढ्ढे में 15 किलो गोबर का खाद और 500 ग्राम फॉस्फोरस को मिला कर डालें।&lt;br /&gt;अधिक पौदावार के लिए अलग अलग किस्मों को 2.2.1 अनुपात में लगायें ताकि पैदावार लगातार मिलता रहे। उदाहरण के लिए अगर कृष्णा ,कंचन और एनए-7 किस्मों का चुनाव किया है तो उसे 80- एनए-7,80- कृष्णा और 40- पौधे कंचन के लगायें।&lt;br /&gt;सिंचाई-&lt;br /&gt;गर्मी में 15 दिन के अंतराल पर सिंचाई दें।मानसून में बारिस के बाद सितंबर-अक्टूबर में ड्रिप सिंचाई दें।&lt;br /&gt;कटाई छटाई-&lt;br /&gt;तीन चार स्वस्थ्य और मुख्य तनों को छोड़कर दिसंबर में छंटनी कर दें।&lt;br /&gt;कीट नियंत्रण-&lt;br /&gt;1-छाल खाने वाली इल्ली उपचार-ग्रसित तना के छेद में इंडोसल्फान या मोनोक्रोटोफॉस को रुई में भिंगोकर छेद बंद कर दें।&lt;br /&gt;रोग से उपचार-पौधे पर रोग के लक्षण दिखने पर इंडोफिल एम 45 का 2 ग्राम एक ली. पानी में मिलाकर छिड़काव करें।&lt;br /&gt;उपज-&lt;br /&gt;फलों को फरवरी में उस समय तोड़े जब वे फीके हरे रंग को छोड़कर हल्के पीले रंग को पकड़ने लगे।फलो को बांस से हुक के सहारे तुड़ाई करें। 10 साल के पौधे से एक बार में 50 से 60 किलो फल मिलता है। इस तरह आंवला के पौधे से 70 साल तक फलों की पैदावार ली जा सकती है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4527566775775163531-1705088201713986718?l=kisanbhai.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kisanbhai.blogspot.com/feeds/1705088201713986718/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4527566775775163531&amp;postID=1705088201713986718' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4527566775775163531/posts/default/1705088201713986718'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4527566775775163531/posts/default/1705088201713986718'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kisanbhai.blogspot.com/2009/05/blog-post_27.html' title='आंवला की खेती'/><author><name>कृष्ण कुमार कन्हैया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16176386032162944448</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_PkZfJrGs8Hk/SN3TArDWljI/AAAAAAAAAB4/V13eB3r7Iv4/S220/Sandeep+Singh+002.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4527566775775163531.post-4245526366328046395</id><published>2009-05-04T07:08:00.000-07:00</published><updated>2009-05-04T07:15:29.482-07:00</updated><title type='text'>बकरी पालन</title><content type='html'>&lt;p&gt;&lt;br /&gt;बकरी पालन प्रायः सभी जलवायु में कम लागत, साधारण आवास, सामान्य रख-रखाव तथा पालन-पोषण के साथ संभव है। इसके उत्पाद की बिक्री हेतु बाजार सर्वत्र उपलब्ध है। इन्हीं कारणों से पशुधन में बकरी का एक विशेष स्थान है।&lt;br /&gt;उपरोक्त गुणों के आधार पर राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी बकरी को ‘गरीब की गाय’ कहा करते थे। आज के परिवेश में भी यह कथन महत्वपूर्ण है। आज जब एक ओर पशुओं के चारे-दाने एवं दवाई महँगी होने से पशुपालन आर्थिक दृष्टि से कम लाभकारी हो रहा है वहीं बकरी पालन कम लागत एवं सामान्य देख-रेख में गरीब किसानों एवं खेतिहर मजदूरों के जीविकोपार्जन का एक साधन बन रहा है। इतना ही नहीं इससे होने वाली आय समाज के आर्थिक रूप से सम्पन्न लोगों को भी अपनी ओर आकर्षित कर रहा है। बकरी पालन स्वरोजगार का एक प्रबल साधन बन रहा है।&lt;br /&gt;बकरी पालन की उपयोगिताः  बकरी पालन मुख्य रूप से मांस, दूध एवं रोंआ (पसमीना एवं मोहेर) के लिए किया जा सकता है। झारखंड राज्य के लिए बकरी पालन मुख्य रूप से मांस उत्पादन हेतु एक अच्छा व्यवसाय का रूप ले सकती है। इस क्षेत्र में पायी जाने वाली बकरियाँ अल्प आयु में वयस्क होकर दो वर्ष में कम से कम 3 बार बच्चों को जन्म देती हैं और एक वियान में 2-3 बच्चों को जन्म देती हैं। बकरियों से मांस, दूध, खाल एवं रोंआ के अतिरिक्त इसके मल-मूत्र से जमीन की उर्वरा शक्ति बढ़ती है। बकरियाँ प्रायः चारागाह पर निर्भर रहती हैं। यह झाड़ियाँ, जंगली घास तथा पेड़ के पत्तों को खाकर हमलोगों के लिए पौष्टिक पदार्थ जैसे मांस एवं दूध उत्पादित करती हैं। बकरियों की विभिन्न उपयोगी नस्लें :   संसार में बकरियों की कुल 102 प्रजातियाँ उपलब्ध है। जिसमें से 20 भारतवर्ष में है। अपने देश में पायी जाने वाली विभिन्न नस्लें मुख्य रूप से मांस उत्पादन हेतु उपयुक्त है। यहाँ की बकरियाँ पश्चिमी देशों में पायी जाने वाली बकरियों की तुलना में कम मांस एवं दूध उत्पादित करती है क्योंकि वैज्ञानिक विधि से इसके पैत्रिकी विकास, पोषण एवं बीमारियों से बचाव पर समुचित ध्यान नहीं दिया गया है। बकरियों का पैत्रिकी विकास प्राकृतिक चुनाव एवं पैत्रिकी पृथकता से ही संभव हो पाया है। पिछले 25-30 वर्षों में बकरी पालन के विभिन्न पहलुओं पर काफी लाभकारी अनुसंधान हुए हैं फिर भी राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय स्तर पर गहन शोध की आवश्यकता है। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली की ओर से भारत की विभिन्न जलवायु की उन्नत नस्लें जैसेः ब्लैक बंगला, बारबरी, जमनापारी, सिरोही, मारबारी, मालावारी, गंजम आदि के संरक्षण एवं विकास से संबंधित योजनाएँ चलायी जा रही है। इन कार्यक्रमों के विस्तार की आवश्यकता है ताकि विभिन्न जलवायु एवं परिवेश में पायी जाने वाली अन्य उपयोगी नस्लों की विशेषता एवं उत्पादकता का समुचित जानकारी हो सके। इन जानकारियों के आधार पर ही क्षेत्र विशेष के लिए बकरियों से होने वाली आय में वृद्धि हेतु योजनाएँ सुचारू रूप से चलायी जा सकती है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भारत की उपयोगी नस्लें निम्नलिखित हैं :-01 ब्लैक बंगाल     02.   जमनापारी  03     बारबरी                     04    बीटल05      सिरोही    06.       मारबारी07.    मालावारी    08.  संगमनेरी09 जाकराना   10       कश्मीरी11    गंजम    12   कच्छी13.  चेगु     14.       गद्दी    &lt;br /&gt;ब्लैक बंगालः इस जाति की बकरियाँ पश्चिम बंगाल, झारखंड, असोम, उत्तरी उड़ीसा एवं बंगाल में पायी जाती है। इसके शरीर पर काला, भूरा तथा सफेद रंग का छोटा रोंआ पाया जाता है। अधिकांश (करीब 80 प्रतिशत) बकरियों में काला रोंआ होता है। यह छोटे कद की होती है वयस्क नर का वजन करीब 18-20 किलो ग्राम होता है जबकि मादा का वजन 15-18 किलो ग्राम होता है। नर तथा मादा दोनों में 3-4 इंच का आगे की ओर सीधा निकला हुआ सींग पाया जाता है। इसका शरीर गठीला होने के साथ-साथ आगे से पीछे की ओर ज्यादा चौड़ा तथा बीच में अधिक मोटा होता है। इसका कान छोटा, खड़ा एवं आगे की ओर निकला रहता है।&lt;br /&gt;इस नस्ल की प्रजनन क्षमता काफी अच्छी है। औसतन यह 2 वर्ष में 3 बार बच्चा देती है एवं एक वियान में 2-3 बच्चों को जन्म देती है। कुछ बकरियाँ एक वर्ष में दो बार बच्चे पैदा करती है तथा एक बार में 4-4 बच्चे देती है। इस नस्ल की मेमना 8-10 माह की उम्र में वयस्कता प्राप्त कर लेती है तथा औसतन 15-16 माह की उम्र में प्रथम बार बच्चे पैदा करती है। प्रजनन क्षमता काफी अच्छी होने के कारण इसकी आबादी में वृद्धि दर अन्य नस्लों की तुलना में अधिक है। इस जाति के नर बच्चा का मांस काफी स्वादिष्ट होता है तथा खाल भी उत्तम कोटि का होता है। इन्हीं कारणों से ब्लैक बंगाल नस्ल की बकरियाँ मांस उत्पादन हेतु बहुत उपयोगी है। परन्तु इस जाति की बकरियाँ अल्प मात्रा (15-20 किलो ग्राम/वियान) में दूध उत्पादित करती है जो इसके बच्चों के लिए अपर्याप्त है। इसके बच्चों का जन्म के समय औसत् वजन 1.0-1.2 किलो ग्राम ही होता है। शारीरिक वजन एवं दूध उत्पादन क्षमता कम होने के कारण इस नस्ल की बकरियों से बकरी पालकों को सीमित लाभ ही प्राप्त होता है।&lt;br /&gt;जमुनापारीः जमुनापारी भारत में पायी जाने वाली अन्य नस्लों की तुलना में सबसे उँची तथा लम्बी होती है। यह उत्तर प्रदेश के इटावा जिला एवं गंगा, यमुना तथा चम्बल नदियों से घिरे क्षेत्र में पायी जाती है। एंग्लोनुवियन बकरियों के विकास में जमुनापारी नस्ल का विशेष योगदान रहा है।&lt;br /&gt;इसके नाक काफी उभरे रहते हैं। जिसे ‘रोमन’ नाक कहते हैं। सींग छोटा एवं चौड़ा होता है। कान 10-12 इंच लम्बा चौड़ा मुड़ा हुआ तथा लटकता रहता है। इसके जाँघ में पीछे की ओर काफी लम्बे घने बाल रहते हैं। इसके शरीर पर सफेद एवं लाल रंग के लम्बे बाल पाये जाते हैं। इसका शरीर बेलनाकार होता है। वयस्क नर का औसत वजन 70-90 किलो ग्राम तथा मादा का वजन 50-60 किलो ग्राम होता है। &lt;br /&gt;इसके बच्चों का जन्म समय औसत वजन 2.5-3.0 किलो ग्राम होता है। इस नस्ल की बकरियाँ अपने गृह क्षेत्र में औसतन 1.5 से 2.0 किलो ग्राम दूध प्रतिदिन देती है। इस नस्ल की बकरियाँ दूध तथा मांस उत्पादन हेतु उपयुक्त है। बकरियाँ सलाना बच्चों को जन्म देती है तथा एक बार में करीब 90 प्रतिशत एक ही बच्चा उत्पन्न करती है। इस जाति की बकरियाँ मुख्य रूप से झाड़ियाँ एवं वृक्ष के पत्तों पर निर्भर रहती है। जमुनापारी नस्ल के बकरों का प्रयोग अपने देश के विभिन्न जलवायु में पायी जाने वाली अन्य छोटे तथा मध्यम आकार की बकरियाँ के नस्ल सुधार हेतु किया गया। वैज्ञानिक अनुसंधान से यह पता चला कि जमनापारी सभी जलवायु के लिए उपयुक्त नही हैं। बीटलः  बीटल नस्ल की बकरियाँ मुख्य रूप से पंजाब प्रांत के गुरदासपुर जिला के बटाला अनुमंडल में पाया जाता है। पंजाब से लगे पाकिस्तान के क्षेत्रों में भी इस नस्ल की बकरियाँ उपलब्ध है। इसका शरीर भूरे रंग पर सफेद-सफेद धब्बा या काले रंग पर सफेद-सफेद धब्बा लिये होता है। यह देखने में जमनापारी बकरियाँ जैसी लगती है परन्तु ऊँचाई एवं वजन की तुलना में जमुनापारी से छोटी होती है। इसका कान लम्बा, चौड़ा तथा लटकता हुआ होता है। नाक उभरा रहता है। कान की लम्बाई एवं नाक का उभरापन जमुनापारी की तुलना में कम होता है। सींग बाहर एवं पीछे की ओर घुमा रहता है। वयस्क नर का वजन 55-65 किलो ग्राम तथा मादा का वजन 45-55 किलो ग्राम होता है। इसके वच्चों का जन्म के समय वजन 2.5-3.0 किलो ग्राम होता है। इसका शरीर गठीला होता है। जाँघ के पिछले भाग में कम घना बाल रहता है। इस नस्ल की बकरियाँ औसतन 1.25-2.0 किलो ग्राम दूध प्रतिदिन देती है। इस नस्ल की बकरियाँ सलाना बच्चे पैदा करती है एवं एक बार में करीब 60% बकरियाँ एक ही बच्चा देती है।&lt;br /&gt;बीटल नस्ल के बकरों का प्रयोग अन्य छोटे तथा मध्यम आकार के बकरियों के नस्ल सुधार हेतु किया जाता है। बीटल प्रायः सभी जलवायु हेतु उपयुक्त पाया गया है।बारबरीः बारबरी मुख्य रूप से मध्य एवं पश्चिमी अफ्रीका में पायी जाती है। इस नस्ल के नर तथा मादा को पादरियों के द्वारा भारत वर्ष में सर्वप्रथम लाया गया। अब यह उत्तर प्रदेश के आगरा, मथुरा एवं इससे लगे क्षेत्रों में काफी संख्या में उपलब्ध है।&lt;br /&gt;यह छोटे कद की होती है परन्तु इसका शरीर काफी गठीला होता है। शरीर पर छोटे-छोटे बाल पाये जाते हैं। शरीर पर सफेद के साथ भूरा या काला धब्बा पाया जाता है। यह देखने में हिरण के जैसा लगती है। कान बहुत ही छोटा होता है। थन अच्छा विकसित होता है। वयस्क नर का औसत वजन 35-40 किलो ग्राम तथा मादा का वजन 25-30 किलो ग्राम होता है। यह घर में बांध कर गाय की तरह रखी जा सकती है। इसकी प्रजनन क्षमता भी काफी विकसित है। 2 वर्ष में तीन बार बच्चों को जन्म देती है तथा एक वियान में औसतन 1.5 बच्चों को जन्म देती है। इसका बच्चा करीब 8-10 माह की उम्र में वयस्क होता है। इस नस्ल की बकरियाँ मांस तथा दूध उत्पादन हेतु उपयुक्त है। बकरियाँ औसतन 1.0 किलो ग्राम दूध प्रतिदिन देती है। &lt;br /&gt;सिरोहीः सिरोही नस्ल की बकरियाँ मुख्य रूप से राजस्थान के सिरोही जिला में पायी जाती है। यह गुजरात एवं राजस्थान के सीमावर्ती क्षेत्रों में भी उपलब्ध है। इस नस्ल की बकरियाँ दूध उत्पादन हेतु पाली जाती है लेकिन मांस उत्पादन के लिए भी यह उपयुक्त है। इसका शरीर गठीला एवं रंग सफेद, भूरा या सफेद एवं भूरा का मिश्रण लिये होता है। इसका नाक छोटा परन्तु उभरा रहता है। कान लम्बा होता है। पूंछ मुड़ा हुआ एवं पूंछ का बाल मोटा तथा खड़ा होता है। इसके शरीर का बाल मोटा एवं छोटा होता है। यह सलाना एक वियान में औसतन 1.5 बच्चे उत्पन्न करती है। इस नस्ल की बकरियों को बिना चराये भी पाला जा सकता है।&lt;br /&gt;झारखंड प्रांत की जलवायु में उपरोक्त वर्णित नस्लों का पालन किया जा सकता है या यहाँ पायी जाने वाली बकरियों के नस्ल सुधार हेतु बीटल, बारबरी, सिरोही एवं जमनापारी के बकरे व्यवहार में लाये जा सकते हैं।&lt;/p&gt;&lt;p&gt; &lt;/p&gt;&lt;p&gt;किन्हीं दो जातियों के बकरा तथा बकरी के संयोग से उत्पन्न बकरी को संकर बकरी कहते हैं। झारखंड में राज्य के पशुपालन विभाग तथा अन्य संस्थाओं द्वारा बकरी के नस्ल सुधार हेतु किसानों के बीच काफी संख्या में जमुनापारी बकरों का वितरण किया गया जिसका वांछित लाभ नहीं हो पाया। इसका मुख्य कारण जमुनापारी नस्ल के विषय में समुचित ज्ञान का अभाव था।&lt;br /&gt;बिरसा कृषि विश्वविद्यालय के अन्तर्गत राँची पशुचिकित्सा महाविद्यालय के वैज्ञानिकों द्वारा इस क्षेत्र में पायी जाने वाली ब्लैक बंगाल बकरी का प्रजनन जमुनापारी तथा बीटल बकरों से कराकर काफी संख्या में संकर नस्ल के बकरी, प्रक्षेत्र तथा बकरी पालकों के यहाँ उत्पन्न किया गया। बकरी के विभिन्न आर्थिक पहलुओं पर गहन अध्ययन से पता चला कि मांस तथा दूध उत्पादन में वृद्धि के लिए बीटल नस्ल उपयुक्त है। अतः ब्लैक बंगाल बकरी का प्रजनन बीटल बकरा से कराकर इस क्षेत्र के लिए उपयुक्त संकर नस्ल की बकरी का उत्पादन किया जा सकता है। यह संकर नस्ल की बकरी, बिहार की (झारखंड के अतिरिक्त) के लिए भी उपयुक्त है।&lt;br /&gt;बीटल नस्ल के संयोग से उत्पादित संकर नस्ल के नर का वजन छः माह की उम्र में औसतन 12-15 किलो ग्राम हो जाता है। जबकि देशी (ब्लैक बंगाल) के नर का वजन केवल 7-8 किलो ग्राम रहता है। इस प्रकार बकरी पालन से होने वाली आय में डेढ़ से दोगुणी वृद्धि संभव है। संकर बकरियों के दूध उत्पादन में देशी की तुलना में करीब तिगुनी वृद्धि होती है। राँची पशुचिकत्सा महाविद्यालय के आस-पास के गाँवों में करीब 90 प्रतिशत बकरियाँ संकर नस्ल की उपलब्ध है। &lt;br /&gt;बकरी प्रजनन - इस क्षेत्र में पायी जानेवाली ब्लैक बंगाल नस्ल के मादा बच्चे करीब 8-10 माह की उम्र में वयस्क हो जाते हैं। अगर शारीरिक वजन ठीक हो तो मादा मेमना (पाठी) को 8-10 माह की उम्र में पाल दिलाना चाहिए अन्यथा 12 महीने की उम्र में पाठी में ऋतुचक्र एवं ऋतुकाल छोटा होता है। वैसे बकरी में ऋतुचक्र करीब 18-20 दिनों का होता है एवं ऋतुकाल 36 घंटों का। बकरियाँ सालों भर गर्म होती है लेकिन अधिकांश बकरियाँ मध्य सितम्बर से मध्य अक्तूबर तथा मध्य मई से मध्य जून के बीच गर्म होती है। अन्य समय में कम बकरियाँ गर्म होती है। ऋतुकाल शुरू होने के 10-12 तथा 24-26 घंटों के बीच 2 बार पाल दिलाने से गर्भ ठहरने की संभावना 90 प्रतिशत से अधिक रहती है। इसे आप इस प्रकार समझ सकते है कि अगर बकरी या पाठी सुबह में गर्म हुई हो तब उसे उसी दीन शाम में एवं दूसरे दिन सुबह में पाल दिलाएं। अगर शाम को गर्म हुई हो  तो दूसरे दिन सुबह में पाल दिलावें।&lt;br /&gt;बकरी पालकों को बकरी के ऋतुकाल (गर्म होने) के लक्षण के विषय में जानकारी रखना चाहिए। बकरी के गर्म होने के लक्षण निम्नलिखित हैं : -&lt;br /&gt;विशेष प्रकार की आवाज निकालना।&lt;br /&gt;लगातार पूंछ हिलाना।&lt;br /&gt;चरने के समय इधर-उधर भागना।&lt;br /&gt;नर के नजदीक जाकर पूंछ हिलाना तथा विशेष प्रकार का आवाज निकालना।&lt;br /&gt;घबरायी हुई सी रहना।&lt;br /&gt;दूध उत्पादन में कमी&lt;br /&gt;भगोष्ठ में सूजन और योनि द्वार का लाल होना&lt;br /&gt;योनि से साफ पतला लेसेदार द्रव्य निकलना तथा नर का मादा के उपर चढ़ना या मादा का नर के उपर चढ़ना।&lt;br /&gt;उपरोक्त लक्षणों को पहचानकर बकरी पालक समझ सकते है कि उनकी बकरी गर्म हुई है अथवा नहीं। इन लक्षणों को जानने पर ही समय से गर्म बकरी को पाल दिलाया जा सकता है। बच्चा पैदा करने के 30-31 दिनों के बाद ही गर्म होने पर बकरी को पाल दिलावें।&lt;br /&gt;सामान्यतया 30-40 बकरियों के लिए एक बकरा काफी है। एक बकरा से एक दिन में केवल एक ही बकरी को पाल दिलाना चाहिए एवं एक सप्ताह में अधिक से अधिक पांच बकरियों को। इस बीच बकरों को अधिक पौष्टिक भोजन देना जरूरी है नहीं तो बकरा कमजोर हो जायेगा।&lt;br /&gt;ब्लैक बंगाल बकरी का प्रजनन बीटल या सिरोही बकरा तथा संकर पाठी या बकरी का प्रजनन संकर बकरा से ही करावें। एक बात ध्यान देने योग्य है कि नर और मादा के बीच बाप-बेटी, बेटा-माँ एवं भाई-बहन का संबंध न हो। अगर दो गाँवों (‘अ’ और ‘ब’) में बीटल या विराही बकरा उपलब्ध कराया गया है तथा इससे संकर बकरी-बकरा का उत्पादन हुआ है तब 8-10 माह के बाद संकर पाठा-पाठी प्रजनन योग्य हो जायेगा। अगर इन दोनों गाँवों के बकरों तथा प्रजनन हेतु संकर पाठा का आपस में अदला-बदली नहीं किया जाय तब भाई-बहन, बाप-बेटी, बेटा-माँ के बीच प्रजनन होगा। अतः बकरा उपलब्ध कराने के 14-16 माह के बीच ‘अ’ गाँव के बकरा को ‘ब’ गाँव में तथा ‘ब’ गाँव के बकरा को ‘अ’ गाँव में अदला-बदला कर देना चाहिए। इसी प्रकार प्रजनन योग्य संकर पाठी का भी अदला-बदला करना चाहिए। संकर पाठी का प्रजनन संकर पाठा से ही कराना लाभप्रद है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt; &lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रजनन हेतु नर का चयन निम्नलिखित गुणों के आधार पर करें-&lt;br /&gt;जुड़वा उत्पन्न नर का चुनाव करें।&lt;br /&gt;नर के माँ का दूध उत्पादन पर ध्यान दें।&lt;br /&gt;नर के शारीरिक वजन एवं बनावट पर ध्यान दें।&lt;br /&gt;नर के अंडकोश की वृद्धि पर ध्यान देना चाहिए। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;गर्भवती बकरियों को गर्भावस्था के अंतिम डेढ़ महीने में अधिक सुपाच्य एवं पौष्टिक भोजन की आवश्यकता होती है क्योंकि इसके पेट में पल रहे भ्रूण का विकास काफी तेजी से होने लगता है। इस समय गर्भवती बकरी के पोषण एवं रख-रखाव पर ध्यान देने से स्वस्थ्य बच्चा पैदा होगा एवं बकरी अधिक मात्रा में दूध देगी जिससे इनके बच्चों में शारीरिक विकास अच्छा होगी।&lt;br /&gt;बकरियों में गर्भावस्था औसतन 142-148 दिनों का होता है। बच्चा देने के 2-3 दिन पहले से बकरी को साफा-सुथरा एवं अन्य बकरी से अलग रखें।&lt;br /&gt;आवास - वातावरण के अनुसार बकरियों के लिए आवास की व्यवस्था करनी चाहिए। यहाँ बकरियों को गर्मी, सर्दी, वर्षा तथा जंगली जानवरों से बचाने योग्य आवास की जरूरत है। आवास के लिए सस्ती से सस्ती सामग्री का व्यवहार करना चाहिए ताकि आवास लागत कम रहे। प्रत्येक वयस्क बकरी के परिवार के लिए 10-12 वर्गफीट जमीन की आवश्यकता होती है। प्रत्येक 10 बकरियों के परिवार के लिये 100-120 वर्ग फीट यानि 10'x12' जमीन की आवश्यकता होगी। बकरा-बकरी को अलग-अलग रखना चाहिए। बकरी के लिए घर के किनारे-किनारे डेढ़ फीट ऊँचा तथा ढ़ाई से तीन फीट चौड़ा मचान बना देना चाहिए। मचान बनाने में यह ध्यान रखना चाहिए कि दो लकड़ी या बांस के टुकड़ों के बीच इतना कम जगह हो कि बकरी या बकरी के बच्चों का पांव उसमें न फंस सके।&lt;br /&gt;अगर सम्भव हो तो घर की दीवाल से सटाकर बकरी गृह का निर्माण करें या किसी चहारदीवारी से। इस प्रकार लागत कम आयेगा। पीछे वाले दीवाल की ऊँचाई 8 फीट तथा आगे वाले का 6 फीट रखें। घर हवादार एवं साफ-सुथरा रहना चाहिए। जमीन मिट्टी एवं बालू से बना होना चाहिए। घर का सतह (जमीन) ढ़ालुआं होना चाहिए ताकि सफाई आसान हो। बकरियों खासकर बच्चों को ठंढ से बचाने का प्रबंध आवास में होना जरूरी है।&lt;br /&gt;पोषण - बकरियाँ चरने के अतिरिक्त हरे पेड़ की पत्तियाँ, हरी घास, दाल चुन्नी, चोकर आदि पसन्द करती है। बकरियों को रोज 6-8 घंटा चराना जरूरी है। यदि बकरी को घर में बांध कर रखना पड़े तब इसे कम से कम दो बार भोजन दें। बकरी हरा चारा (लूसर्न, बरसीम, जई, मकई, नेपियर आदि) और पत्ता (बबूल, बेर, बकाइन, पीपल, बरगद, गुलर कटहल आदि) भी खाती है। एक वयस्क बकरी को औसतन एक किलो ग्राम घास या पत्ता तथा 100-250 ग्राम दाना का मिश्रण (मकई दरों, चोकर, खल्ली, नमक मिलाकर) दिया जा सकता है। उम्र तथा वजन के अनुसार भोजन की मात्रा को बढ़ाया या घटाया जा सकता है। गाय-भैंस की तरह भी कृट्टी/भूसा में दाना का मिश्रण पानी में मिलाकर बकरी को दे सकते है। आदत लग जाने पर बकरियाँ भी गाय-भैंस की तरह खाना खा सकती है। बकरा, दूध देने वाली बकरी एवं गर्भवती बकरी के पोषण पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत होती है।&lt;br /&gt;बकरियों के लिए उपयोगी चाराझाड़ियाँ                  : बेर, झरबेरपेड़ की पत्तियाँ           : नीम, कटहल, पीपल, बरगद, जामुन, आम, बकेन, गुल्लड, शीशम चारा वृक्ष की पत्तियाँ    : सू-बबूल, सेसबेनियासदाबहार घास          : दूब, दीनानाथ, गिनी घासहरा घास     : लोबिया, बरसीम, लूसर्न आदि।&lt;/p&gt;&lt;p&gt; &lt;/p&gt;&lt;p&gt;बाजार में मांस की मांग दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है। जिसके कारण बकरियों की मूल्यों में भी काफी वृद्धि हुई है। ब्लैक बंगाल मांस उत्पादन हेतु उपयुक्त है। इसका प्रजनन बीटल या सिरोही नस्ल के बकरों से कराकर अधिक लाभ ले सकते है क्योंकि इससे उत्पन्न नर बच्चे छः माह की उम्र में औसतन 14-15 किलो ग्राम वजन प्राप्त कर लेता है। मांस उत्पादन वजन का 50 प्रतिशत मानकर चलें तब एक पाठा से 7-7.5 किलोग्राम मांस मिलेगा। जिसका बाजार भाव (100 रुपये/ किलो ग्राम) 700 रुपये से 750 रुपये तक आयेगा। इसके अतिरिक्त खाल, सिर, खूड़, आँत आदि से भी लाभ प्राप्त होता है। &lt;br /&gt;अधिक वजन के लिए नर बच्चों का बंध्याकरण 2 माह की उम्र में कराना चाहिए तथा 15 किलोग्राम वजन प्राप्त कर लेने के बाद माँस हेतु उपयोग में लाना चाहिए। इस वजन को प्राप्त कर लेने पर, वजन की तुलना में माँस उत्पादन में वृद्धि होती है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt; &lt;/p&gt;&lt;p&gt;अन्य पशुओं की तरह बकरियाँ भी बीमार पड़ती है। बीमार पड़ने पर उसकी मृत्यु भी हो सकती है। बकरियों में मृत्यु दर कम कर बकरी पालन से होने वाली आय में वृद्धि की जा सकती है। बीमारी की अवस्था में पशुचिकित्सक की राय लेनी चाहिए।&lt;br /&gt;बकरियों में होने वाले रोग(क) परजीवी रोग - बकरी में परजीवी से उत्पन्न रोग अधिक होते है। परजीवी रोग से काफी क्षति पहुँचती है।बकरी को आंतरिक परजीवी से अधिक हानि पहुँचती है। इसमें गोल कृमि, फीता कृमि, फ्लूक, एमफिस्टोम और प्रोटोजोआ प्रमुख है। इसके प्रकोप के कारण उत्पादन में कमी, वजन कम होना, दस्त लगना, शरीर में खून की कमी होती है। शरीर का बाल तथा चमड़ा रूखा-रूखा दीखता है। इसके कारण पेट भी फूल सकता है तथा जबड़े के नीचे हल्की सूजन भी हो सकती है।&lt;br /&gt;इसके आक्रमण से बचाव तथा उपचार के लिए नियमित रूप से बकरी के मल का जाँच कराकर कृमि नाशक दवा (नीलवर्म, पानाकिआर, वेन्डाजोल, वेनमीन्थ, डिस्टोडीन आदि) देनी चाहिए। कृमि नाशक दवा तीन से चार माह के अंतराल पर खासकर वर्षा ऋतु शुरू होने के पहले और बाद अवश्य दें।  &lt;br /&gt;आंतरिक परजीवी के अलावे वाह्य परजीवी से भी बकरी को बहुत हानि पहुँचती है। बकरी में विशेषकर छौनों में जूँ लग जाते है। गेमेक्सीन या मालाथिऑन या साईथिऑन का प्रयोग कर जूँ से बचाना जरूरी है। बकरी में खुजली की बीमारी भी वाह्य परजीवी के कारण ही होती है। बकरी को खुजली से बचाने के लिए प्रत्येक तीन महीने पर 0.25 प्रतिशत (1 लीटर पानी में 5 मिली लीटर दवा) मालाथिऑन या साईथिऑन का घोल से नहलाना चाहिए। नहलाने के पहले बकरी को खासकर गर्दन, नाक, पूँछ जाँघ के अन्दर का भाग तथा छाती के नीचने भाग को सेभलॉन का घोल या कपड़ा धोने वाला साबुन लगा देना चाहिए। इसके बाद मालाथिऑन या साईथिऑन के घोल से बकरी को नहलावें तथा पूरा शरीर को ब्रस से खूब रगड़े। बकरी को दवा का घोल पीने नहीं दें क्योंकि यह जहर है। नहलाने के एक घंटा बाद जहाँ-जहाँ खुजली है करंज का तेल लगा दें। खुजली वाले बकरी को एक दिन बीच कर 4-5 बार नहलाने से खुजली ठीक हो जायेगा। जिस दिन सभी बकरी को नहलाया जाय उसी दिन बकरी घर का छिड़काव भी उसी दवा के 2% घोल (1 लीटर पानी में 40 मिली लीटर दवा मिलाकर) से करें। इस तरह बकरी को खुजली से बचाया जा सकता है। दवा लगाने के बाद हाथ की सफाई अच्छी तरह करें क्योंकि यह जहर है।&lt;br /&gt;(ख) सर्दी-जुकाम (न्यूमोनिया)– यह रोग कीटाणु, सर्दी लगने या प्रतिकूल वातावरण के कारण हो सकता है। इस रोग से पीड़ित बकरी को बुखार रहता है, सांस लेने में तकलीफ होती है एवं नाक से पानी या नेटा निकलता रहता है। कभी-कभी न्यूमोनिया के साथ दस्त भी होता है। सर्दी-जुकाम की बीमारी बच्चों में ज्यादा होती है एवं इससे अधिक बच्चे मरते हैं। इस रोग से ग्रसित बकरी या बच्चों को ठंढ़ से बचावें तथा पशुचिकित्सक की सलाह पर उचित एण्टीबायोटिक दवा (ऑक्सी टेट्रासाइकलिन, डाइक्स्ट्रीसिन, पेनसिलीन, जेन्टामाइसिन, इनरोफ्लोक्सासीन, सल्फा आदि) दें। उचित समय पर उपचार करने से बीमारी ठीक हो जायेगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(ग) पतला दस्त (छेरा रोग) - यह खासकर पेट की कृमि या अधिक हरा चारा खाने से हो सकता है। यह कीटाणु (बैक्टीरिया या वायरस) के कारण भी होता है।इसमें पतला दस्त होता है। खून या ऑव मिला हुआ दस्त हो सकता है। सर्वप्रथम उचित दस्त निरोधक दवा (सल्फा, एण्टीबायोटिक, मेट्रान, केओलिन, ऑरीप्रीम, नेवलोन आदि) का प्रयोग कर दस्त को रोकना जरूरी है। दस्त वाले पशु को पानी में ग्लूकोज तथा नमक मिलाकर अवश्य पिलाते रहना चाहिए। कभी-कभी सूई द्वारा पानी चढ़ाने की भी आवश्यकता पड़ सकती है। पतला दस्त ठीक होने (यानि भेनाड़ी आ जाने पर) के बाद मल की जाँच कराकर उचित कृमि नाशक दवा दें। नियमित रूप से कृमि नाशक दवा देते रहने से पतला दस्त की बीमारी कम होगी। इस बीमारी का उचित उपचार पशुचिकित्सक की सलाह से करें। &lt;br /&gt;(घ) सुरहा-चपका – यह संक्रामक रोग है। इस रोग में जीभ, ओंठ, तालु तथा खुर में फफोले पड़ जाते हैं। बकरी को तेज बुखार हो सकता है। मुँह से लार गिरता है तथा बकरी लँगड़ाने लगती है।&lt;br /&gt;ऐसी स्थिति में बीमार बकरी को अलग रखें। मुँह तथा खुर को लाल पोटास (पोटाशियम परमेगनेट) के घोल से साफ करें। खुरों के फफोले या घाव को फिनाइल से धोना चाहिए। मुँह पर सुहागा और गंधक के मिश्रण का लेप लगा सकते हैं।इस रोग से बचाव के लिए मई-जून माह में एफ॰एम॰डी॰ का टीका लगवा दें। (ङ) आंत ज्वर (इन्टेरोटोक्सिमियां)- इस बीमारी में खाने की रुचि कम हो जाती है। पेट में दर्द होता है, दाँत पीसना भी संभव है, पतला दस्त तथा दस्त के साथ खून आ सकता है।दस्त होने पर नमक तथा चीनी मिला हुआ पानी देते रहें। एण्टीबायोटिक एवं सल्फा का प्रयोग करें। इस बीमारी से बचाव के लिए इन्टेरोटेक्सिमियां या एम.सी.सी. का टीका बरसात शुरू होने के पहले लगवा दें। (च) पेट फूलना- इस बीमारी में भूख कम लगती है, पेट फूल जाता है, पेट को बजाने पर ढ़ोल के जैसा आवाज निकलता है।इस बीमारी में टिमपॉल पाउडर 15-20 ग्राम पानी में मिलाकर 3-3 घंटों पर दें। ब्लोटी सील दवा पिलावें तथा एभील की गोली खिलावें। आप हींग मिलाकर तीसी का तेल भी पिला सकते हैं। कभी-कभी इन्जेक्सन देने वाला सूई को पेट में भोंक कर गैस बाहर निकालना पड़ता है। &lt;br /&gt;(छ) जोन्स रोग - पतला दस्त का बार-बार होना, बदबूदार दस्त आना तथा वजन में क्रमशः गिरावट इस बीमारी का पहचान है।इससे ग्रसित बकरी को अलग रखें। अगर स्वास्थ्य में गिरावट नहीं हुई हो तो इस तरह के पशु का उपयोग मांस के लिए किया जा सकता है अन्यथा मरने के बाद इसे जमीन में गाड़ दें ताकि बीमारी फैले नहीं।&lt;br /&gt;(ज) थनैल - बकरी के थन में सूजन, दूध में खराबी कभी-कभी बुखार आ जाना इस रोग के लक्षण हैं।दूध निकालने के बाद थन में पशु चिकित्सक की सलाह से दवा देनी चाहिए। थनैल वाले थन को छूने के बाद हाथ अच्छी तरह साबुन एवं डिटॉल से साफ कर लेना चाहिए।&lt;br /&gt;(झ) कोकसिडिओसिस - यह बकरी के बच्चों में अधिक होता है लेकिन वयस्क बकरी में भी हो सकता है। इसके प्रकोप से पतला दस्त, कभी-कभी खूनी दस्त भी हो सकता है।&lt;br /&gt;इससे बचाव के लिए पशुचिकित्सक की सलाह पर उचित दवा (सल्फा, एम्प्रोसील, नेफटीन आदि) दें। रोग हो जाने पर दस्त का इलाज करें तथा मल की जांच के बाद उचित दवा दें।&lt;br /&gt;(ञ) कन्टेजियस इकथाईमा - इस रोग से ग्रसित बकरी के बच्चों के ओठों पर तथा दोनों जबड़ों के बीच वाली जगह पर छाले पड़ जाते है जो कुछ दिनों के बाद सूख जाता है तथा पपड़ी पड़ जाता है यह संक्रामक रोग है।इस रोग से ग्रस्त पशु को अलग रखें तथा ओठों को लाल पोटास के घोल से धोकर बोरोग्लिसरिन लगावें।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बकरी पालकों को निम्नलिखित बातों पर ध्यान देनी चाहिए -&lt;br /&gt;ब्लैक बंगाल बकरी का प्रजनन बीटल या सिरोही नस्ल के बकरों से करावें।&lt;br /&gt;पाठी का प्रथम प्रजनन 8-10 माह की उम्र के बाद ही करावें।&lt;br /&gt;बीटल या सिरोही नस्ल से उत्पन्न संकर पाठी या बकरी का प्रजनन संकर बकरा से करावें।&lt;br /&gt;बकरा और बकरी के बीच नजदीकी संबंध नहीं होनी चाहिए।  &lt;br /&gt;बकरा और बकरी को अलग-अलग रखना चाहिए।&lt;br /&gt;पाठी अथवा बकरियों को गर्म होने के 10-12 एवं 24-26 घंटों के बीच 2 बार पाल दिलावें।&lt;br /&gt;बच्चा देने के 30 दिनों के बाद ही गर्म होने पर पाल दिलावें।&lt;br /&gt;गाभीन बकरियों को गर्भावस्था के अन्तिम डेढ़ महीने में चराने के अतिरिक्त कम से कम 200 ग्राम दाना का मिश्रण अवश्य दें।&lt;br /&gt;बकरियों के आवास में प्रति बकरी 10-12 वर्गफीट का जगह दें तथा एक घर में एक साथ 20 बकरियों से ज्यादा नहीं रखें।&lt;br /&gt;बच्चा जन्म के समय बकरियों को साफ-सुथरा जगह पर पुआल आदि पर रखें।&lt;br /&gt;बच्चा जन्म के समय अगर मदद की आवश्यकता हो तो साबुन से हाथ धोकर मदद करना चाहिए।&lt;br /&gt;जन्म के उपरान्त नाभि को 3 इंच नीचे से नया ब्लेड से काट दें तथा डिटोल या टिन्चर आयोडिन या वोकांडिन लगा दें। यह दवा 2-3 दिनों तक लगावें।&lt;br /&gt;बकरी खास कर बच्चों को ठंढ से बचावें।&lt;br /&gt;बच्चों को माँ के साथ रखें तथा रात में माँ से अलग कर टोकरी से ढक कर रखें।&lt;br /&gt;नर बच्चों का बंध्याकरण 2 माह की उम्र में करावें।&lt;br /&gt;बकरी के आवास को साफ-सुथरा एवं हवादार रखें।&lt;br /&gt;अगर संभव हो तो घर के अन्दर मचान पर बकरी तथा बकरी के बच्चों को रखें।&lt;br /&gt;बकरी के बच्चों को समय-समय पर टेट्रासाइकलिन दवा पानी में मिलाकर पिलावें जिससे न्यूमोनिया का प्रकोप कम होगा।&lt;br /&gt;बकरी के बच्चों को कोकसोडिओसीस के प्रकोप से बचाने की दवा डॉक्टर की सलाह से करें।&lt;br /&gt;तीन माह से अधिक उम्र के प्रत्येक बच्चों एवं बकरियों को इन्टेरोटोक्सिमिया का टीका अवश्य लगवायें।&lt;br /&gt;बकरी तथा इनके बच्चों को नियमित रूप से कृमि नाशक दवा दें।&lt;br /&gt;बकरियों को नियमित रूप से खुजली से बचाव के लिए जहर स्नान करावे तथा आवास में छिड़काव करें।&lt;br /&gt;बीमार बकरी का उपचार डॉक्टर की सलाह पर करें।&lt;br /&gt;नर का वजन 15 किलो ग्राम होने पर मांस हेतु व्यवहार में लायें।&lt;br /&gt;खस्सी और पाठी की बिक्री 9-10 माह की उम्र में करना लाभप्रद है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;आय की गणना यह मान कर की गई है कि 2 वर्ष में एक बकरी तीन बार बच्चों को जन्म देगी तथा एक-बार में 2 बच्चे उत्पन्न करेगी। बकरियों की देख-रेख घर की औरतों तथा बच्चें के द्वारा किया जायेगा। सभी बकरियों को 8-10 घंटे प्रति दिन चराया जायेगा।&lt;br /&gt;आय की गणना करते समय यह माना गया कि चार बच्चे की मृत्यु हो जायेगी तथा 13 नर और 13 मादा बिक्री के लिए उपलब्ध होंगे। 1 नर और मादा को प्रजनन हेतु रखकर पुरानी 2 बकरियों की बिक्री की जायेगी।&lt;br /&gt;12 संकर नर का 9-10 माह की उम्र में विक्रय से प्राप्त राशि 1000 रुपये प्रति बकरे की दर से – 12,000 रुपये11 संकर नर का 9-10 माह की उम्र में विक्रय से प्राप्त राशि 1200 रुपये प्रति बकरे की दर से- 13,200 रुपये&lt;br /&gt;2 ब्लैक बंगाल मादा की बिक्री से प्राप्त राशि 500 की प्रति बकरी की दर से- 1000 रुपयेकुल आमदनी-  26,200 रुपये            &lt;br /&gt;कुल आमदनीः आय आवर्ती खर्च -      ब्लैक बंगाल बकरी तथा बकरा के मूल्य का 20 प्रतिशत- आवास खर्च का 10 प्रतिशत-बर्त्तन खर्च का 20= 26,200-8000- का 20 %- 5000 का 10% - 500 का 20 %= 26,200 – 8000 – 1900 – 500 - 100= 26,200 – 10,500= 15,700 रुपये प्रतिवर्ष= 1570 रुपये प्रति बकरी प्रति वर्ष&lt;br /&gt;इस आय के अतिरिक्त बकरी पालक प्रतिवर्ष कुल 3400 रुपये मूल्य के बराबर एक संकर बकरा तथा दो बकरी का बिक्री नहीं कर प्रजनन हेतु खुद रखेगा। पांच वर्षों के बाद बकरी पालक के पास 10 संकर नस्ल की बकरियाँ एवं उपयुक्त संख्या में संकर बकरा उपलब्ध होगा तथा बकरी गृह एवं बर्त्तन का कुल खर्च भी निकल आयेगा।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सूचना प्रदाता-प्रसार शिक्षा निदेशालयबिरसा कृषि विश्वविद्यालयराँची – 834006 (झारखंड)&lt;/p&gt;&lt;p&gt; &lt;/p&gt;&lt;p&gt; &lt;/p&gt;&lt;p&gt; &lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4527566775775163531-4245526366328046395?l=kisanbhai.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kisanbhai.blogspot.com/feeds/4245526366328046395/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4527566775775163531&amp;postID=4245526366328046395' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4527566775775163531/posts/default/4245526366328046395'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4527566775775163531/posts/default/4245526366328046395'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kisanbhai.blogspot.com/2009/05/blog-post_3444.html' title='बकरी पालन'/><author><name>कृष्ण कुमार कन्हैया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16176386032162944448</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_PkZfJrGs8Hk/SN3TArDWljI/AAAAAAAAAB4/V13eB3r7Iv4/S220/Sandeep+Singh+002.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4527566775775163531.post-477885984698992006</id><published>2009-05-01T09:36:00.000-07:00</published><updated>2009-05-01T10:16:49.241-07:00</updated><title type='text'>खाद्य प्रसंस्‍करण कृषि अथवा उद्यान</title><content type='html'>खाद्य प्रसंस्‍करण कृषि अथवा उद्यान उपजों को ग्रेडिंग, सोर्टिंग, पैकजिंग आदि जैसी विभिन्‍न प्रौद्योगिकियां जो खाद्य उत्‍पादों के शेल्‍फ जीवन को बढ़ाती हैं, के उपयोग से मूल्‍य वर्धन की प्रक्रिया है। एक सुदृढ़ और गतिशील खाद्य प्रसंस्‍करण क्षेत्र किसी देश के समग्र आर्थिक ढांचे में महत्‍वपूर्ण भूमिका अदा करता है। यह उद्योग और कृषि के बीच महत्‍वपूर्ण संपर्क और साहचर्य प्रदान करता है। इसकी तत्‍काल वृद्धि और रोजगार की संभावना वाले क्षेत्र के रूप में पहचान की गई है। यह कृषि क्रिया-कलापों के विविधीकरण, मूल्‍य वर्धन अवसरों को सुधारने और कृषि खाद्य उत्‍पादों के निर्यात के लिए अतिरिक्‍त उत्‍पाद की तरह कार्य करता है।                                              &lt;p&gt;भारत में खाद्य प्रसंस्‍करण उद्योग उत्‍पादन, खपत और निर्यात की संभावनाओं के संदर्भ में सबसे बड़े उद्योग में से एक है। &lt;a href="http://business.gov.in/hindi/outerwin.htm?id=http://mofpi.nic.in/" target="_blank" class="bluelink11px"&gt;खाद्य प्रसंस्‍करण उद्योग मंत्रालय&lt;/a&gt; ऐसे प्रवेषक खाद्य प्रसंस्‍करण क्षेत्र के विकास के लिए उत्‍तरदायी मुख्‍य केंद्रीय अभिकरण है। मंत्रालय में फल एवं सब्जियां के उत्‍पाद, डेयरी, माँस, मुर्गी पालन, मछली पालन, उपभोक्‍ता खाद्य, अनाज, गैर-शीरा आधारित एल्‍को‍होलिक पेयों, वातित जल और मृदु पेय शामिल है। इसका उद्देश्‍य ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के बढ़े हुए अवसर उत्‍पन्‍न करना, किसानों को आधुनिक प्रौद्योगिकी से लाभ उठाने में समर्थ बनाना और संसाधित खाद्य की मांग बढ़ाना है।मंत्रालय इस उद्योग की स्‍वस्‍थ कार्यप्रणाली के लिए प्रेरक वातावरण सृजित करके इस क्षेत्र में व्‍यापक निवेश को प्रोत्‍साहित करने में सक्रिय रूप से शामिल है। इस प्रयोजन के लिए इस क्षेत्र को समय समय पर घोषित बहुत से नीतिगत उपायों, प्रोत्‍साहनों और योजनाओं के साथ उच्‍च प्राथमिकता प्रदान की गई है। 'राष्‍ट्रीय खाद्य प्रसंस्‍करण नीति' ऐसी एक पहल है जिसका उद्देश्‍य निम्‍नलिखित के माध्‍यम से इस उद्योग में निवेश हेतु उचित वातावरण तैयार करना है:-&lt;/p&gt;                                             &lt;ul&gt;&lt;li&gt;ताजे भोजन, प्रसंस्‍कृत भोजन और प्रसंस्‍कृत भोजन के उत्‍पादन पर कर संरचना के यौक्‍ताकरण के लिए राजकोषीय प्रोत्‍साहन/हस्‍तक्षेप।&lt;br /&gt;                                                 &lt;br /&gt;                                              &lt;/li&gt;&lt;li&gt;खाद्य उत्‍पादों के साथ साथ अच्‍छे माल। भावी विपणन, साम्‍यीकरण निधि आदि से संबंधित प्रावधानों को शामिल करने के लिए समुचित अधिनियमन द्वारा खाद्य विधियों का सुमेलीकरण और सरलीकरण।&lt;br /&gt;                                                 &lt;br /&gt;                                              &lt;/li&gt;&lt;li&gt;उत्‍पादन और उत्‍पादकता बढ़ा कर वर्ष भर सही प्रकार की और अच्‍छी कच्‍ची सामग्री की उपलब्‍धता का विस्‍तार करना।&lt;br /&gt;                                                 &lt;br /&gt;                                              &lt;/li&gt;&lt;li&gt;कच्‍ची सामग्री की उपलब्‍धता और संसाधित उत्‍पादों की विपणनता तुलना में इस क्षेत्र में योजित निवेश में समर्थ बनाने के लिए आंकड़ा आधार और बाज़ार आसूचना प्रणाली को सुदृढ़ बनाना।&lt;br /&gt;                                                 &lt;br /&gt;                                              &lt;/li&gt;&lt;li&gt;उत्‍पादन के निकट क्षेत्र में कृषि प्रसंस्‍करण सुविधाओं की स्‍थापना को प्रोत्‍साहित करना ताकि अपशिष्‍ट से बचा जा सके और ढुलाई लागत को कम किया जा सके।&lt;br /&gt;                                              &lt;/li&gt;&lt;/ul&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4527566775775163531-477885984698992006?l=kisanbhai.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kisanbhai.blogspot.com/feeds/477885984698992006/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4527566775775163531&amp;postID=477885984698992006' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4527566775775163531/posts/default/477885984698992006'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4527566775775163531/posts/default/477885984698992006'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kisanbhai.blogspot.com/2009/05/blog-post.html' title='खाद्य प्रसंस्‍करण कृषि अथवा उद्यान'/><author><name>कृष्ण कुमार कन्हैया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16176386032162944448</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_PkZfJrGs8Hk/SN3TArDWljI/AAAAAAAAAB4/V13eB3r7Iv4/S220/Sandeep+Singh+002.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4527566775775163531.post-4711592545918804764</id><published>2008-12-29T00:17:00.000-08:00</published><updated>2008-12-29T06:36:37.089-08:00</updated><title type='text'>गेहूं में सिंचाई का महत्व</title><content type='html'>भारत के अनाज उत्पादन में गेहूं का अपना एक अलग महत्व है। देश में चावल के बाद गेंहू की खपत सबसे अधिक है। यही कारण है कि उत्तरी भारत के मैदानी भागों में गेहूं की खेती पर ज्यादा जोर दिया जाता है। अगर इसके उत्पादन को देखें तो इसमें और अधिक सुधार की गुंजाइस है,बशर्ते कि इसके वैज्ञानिक तरीके अपनाये जाएं। वैसे तो बीज से लेकर फसल कटाई तक आधुनिक तरीके की जरूरत पड़ती है, लेकिन फसल के बीच में भी किसान अगर कुछ बातों पर गौर करें तो उत्पादन में 40 फीसदी की वृद्धि हो सकती है। जहां तक बीच फसल में ध्यान देने योग्य बातें हैं उनमें सिंचाई सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। अक्सर किसान समझते हैं कि दो या तीन सिंचाई से गेहूं का अच्छा उत्पादन संभव है। लेकिन जानकारी के लिए बाता दें कि मैदानी भागों में जहां सिंचाई के बेहतर साधन मौजूद हैं,वहां कम से कम 6 सिंचाई उत्पादन को बढ़ा सकता है। ऐसा देखा जाता है कि सर्दी के मौसम में किसान सिंचाई में कंजूसी करते हैं। जबकि इस मौसम में वातावरण में नमी का गिरना और चढ़ना जारी रहता है। ऐसे में गेहूं के लिए नमी की खास जरूरत पड़ती है।इस समय में अगर मिट्टी में नमी बनाये रखा जाय तो फसल के बढ़वार में काफी सहायक सिद्ध होता है और पाला से भी सुरक्षा हो जाता है। इसके अलावा जब गेहूं के बाली में दूध बनने लगे तो उस समय भी सिंचाई पर खास ध्यान देना जरूरी होता है  , इस समय पौधे में पानी की कमी होगी तो दाने पुष्ट नहीं बनेंगे।जबकि ठीक इसी समय किसान सिंचाई नहीं करना चाहते हैं।उन्हें ये डर होता है कि उनकी फसल पानी लगने से गिर जायेगी।कुछ हद तक ये बात सही भी है,लेकिन जब बाजार में बौने किस्म के बीज उपलब्ध हैं जो उत्पादन में भी काफी उन्न्त हैं तो उन्हीं बीजों का चुनाव करें। फिलहाल जहां बौने किस्म लगाये जा रहे हैं वहां के किसान गेहूं के बाली में दुध बनने के समय सिंचाई का ध्यान जरूर रखें।.....धन्यवाद....&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4527566775775163531-4711592545918804764?l=kisanbhai.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kisanbhai.blogspot.com/feeds/4711592545918804764/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4527566775775163531&amp;postID=4711592545918804764' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4527566775775163531/posts/default/4711592545918804764'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4527566775775163531/posts/default/4711592545918804764'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kisanbhai.blogspot.com/2008/12/blog-post_29.html' title='गेहूं में सिंचाई का महत्व'/><author><name>कृष्ण कुमार कन्हैया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16176386032162944448</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_PkZfJrGs8Hk/SN3TArDWljI/AAAAAAAAAB4/V13eB3r7Iv4/S220/Sandeep+Singh+002.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4527566775775163531.post-5093222128522619682</id><published>2008-12-11T05:55:00.000-08:00</published><updated>2008-12-11T06:04:30.745-08:00</updated><title type='text'>इन्टरनेट पर कृषि आधारित एक नया चैनल</title><content type='html'>ब्लॉग के सभी पाठक के लिए एक नया संदेश है। आप इन्टरनेट पर मेरा चैनल देख सकते हैं। इसमें कृषि की आधुनिक जानकारी होगी। अगर आपके पास इससे सम्बंधित कोई वीडियो है तो मुझे भेजें,धन्यवाद।&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.mogulus.com/agriwatch"&gt;http://www.mogulus.com/agriwatch&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4527566775775163531-5093222128522619682?l=kisanbhai.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kisanbhai.blogspot.com/feeds/5093222128522619682/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4527566775775163531&amp;postID=5093222128522619682' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4527566775775163531/posts/default/5093222128522619682'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4527566775775163531/posts/default/5093222128522619682'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kisanbhai.blogspot.com/2008/12/blog-post_11.html' title='इन्टरनेट पर कृषि आधारित एक नया चैनल'/><author><name>कृष्ण कुमार कन्हैया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16176386032162944448</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_PkZfJrGs8Hk/SN3TArDWljI/AAAAAAAAAB4/V13eB3r7Iv4/S220/Sandeep+Singh+002.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4527566775775163531.post-5767117745490615843</id><published>2008-12-10T23:16:00.001-08:00</published><updated>2008-12-10T23:28:36.297-08:00</updated><title type='text'>ब्लॉग से जुड़ने के लिए धन्यवाद</title><content type='html'>श्री धीरू जी ,चंद्रजीत जी, अंकित जी,प्रतिमा जी आपको बहुत बहुत धन्यवाद देता हूँ । एक संपादक होने की वजह से समय कम निकाल पाता हूँ फ़िर भी एग्रीकल्चर में मेरी रूचि है और इसमें मैंने करीब १००० टीवी एपिसोड बनाया है। भारत के किसानो की दशा को देख कर उन सारे लोगों को आगे आना चाहिए ,हम आपके साथ हैं।  धन्यवाद।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4527566775775163531-5767117745490615843?l=kisanbhai.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kisanbhai.blogspot.com/feeds/5767117745490615843/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4527566775775163531&amp;postID=5767117745490615843' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4527566775775163531/posts/default/5767117745490615843'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4527566775775163531/posts/default/5767117745490615843'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kisanbhai.blogspot.com/2008/12/blog-post.html' title='ब्लॉग से जुड़ने के लिए धन्यवाद'/><author><name>कृष्ण कुमार कन्हैया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16176386032162944448</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_PkZfJrGs8Hk/SN3TArDWljI/AAAAAAAAAB4/V13eB3r7Iv4/S220/Sandeep+Singh+002.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4527566775775163531.post-4166280585924996273</id><published>2008-11-02T23:33:00.000-08:00</published><updated>2008-11-02T23:36:10.391-08:00</updated><title type='text'>रबी की खेती</title><content type='html'>&lt;div align="left"&gt;&lt;/div&gt;&lt;p align="left"&gt; रबी मौसम में गेहूँ एक प्रमुख फसल है, खासकर मैदानी भागो में इसकी खेती किसानों के आमदनी का एक अहम ज़रिया है. इसलिए इसकी खेती में आधुनिक तौर तरीके को अपनाना ज़रूरी है.अभी गेहूँ की बीजाई हो रही है और कुछ पिच्छेती किस्म की बीजाई बाकी है.किसान भाइयों को ये बता दें की फसल चाहे कोई भी हो बीज उपचार बहुत ज़रूरी है.अगर आप बीजाई के पहले उपचार कर लेते हैं तो उपज में २५ प्रतिशत की बढ़ोतरी तय है.सबसे पहले आप बीज की गुणवत्ता को ध्यान में रखकर ही बाजार से बीज खरीदें . अगर आप अपना बीज लेते हैं तो सबसे पहले उसकी ग्रेडिंग कर लें.ग्रेडिंग के बाद उपचार करने के लिए एग्रोसिन जी एन या बाजार में उपलब्ध दवाई को बीज को उपचारित करें.उपचारित करने के लिए पैकेट में लिखे मात्रा को गेहूँ के बीज में मिलाएँ, दवाई मिलाते समय गेहूँ को पानी से हल्का भींगा लें ताकि दवाई अच्छी तरह से मिल जाय.इसके बाद छाया में बीज को सूखा लें.अब खेत की तैयारी कर बीज की बआई करें .गेहूँ बूआई के पहले उपचार उसी तरह ज़रूरी है जैसे पेट में पल रहे बच्चे के लिए टीका .इसलिए आप आज ही ये तय कर लें की बूआई उपचार के बाद ही करेंगे .अगले अंक में सिंचाई के महत्व के बारे बताएँगे की इसपर ध्यान देना कितना ज़रूरी है &lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4527566775775163531-4166280585924996273?l=kisanbhai.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kisanbhai.blogspot.com/feeds/4166280585924996273/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4527566775775163531&amp;postID=4166280585924996273' title='6 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4527566775775163531/posts/default/4166280585924996273'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4527566775775163531/posts/default/4166280585924996273'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kisanbhai.blogspot.com/2008/11/blog-post.html' title='रबी की खेती'/><author><name>कृष्ण कुमार कन्हैया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16176386032162944448</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_PkZfJrGs8Hk/SN3TArDWljI/AAAAAAAAAB4/V13eB3r7Iv4/S220/Sandeep+Singh+002.jpg'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4527566775775163531.post-4058042806334751026</id><published>2008-08-17T17:01:00.000-07:00</published><updated>2008-10-28T02:18:41.140-07:00</updated><title type='text'>कृषि प्रधान देश</title><content type='html'>भारत कृषि प्रधान देश है लेकिन किसानों की दुर्दशा को देखकर ये कहना गतल नहीं होगा की भारत कूर्सी प्रधान देश बन गया&lt;span class=""&gt; है । देश की जनसंख्या का लगभग ८० फीसदी लोग  गांवों में रहते  है । &lt;/span&gt;जनसंख्या जिस रफ्तार से बढ़ी है वैसे में उसका पेट भरने के लिए अनाज के उत्पादन में सुधार तो हुआ है लेकिन दूसरी तरफ विडंबना ये भी है कि किसानों को खेती से लाभ तो दूर पूंजी वापस होना मुश्किल हो रहा है ।  नेता जो उनकी रहनुमायी करने का  दावा&lt;span class=""&gt;  कर &lt;/span&gt;संसद में जाता है,  किसानों को ही भूल गए  हैं । ऐसा क्यों है  , शायद देश के नीति निर्धारण करने वाले नेताओं को लगता है कि देश की तरक्की खेतीबारी से संभव नहीं&lt;span class=""&gt;  है । &lt;/span&gt;बजट में कृषि के लिए बड़ी बड़ी योजनायें बनाई जाती हैं, लेकिन वो सब के सब फिसड्डी साबित होती हैं। अफसोस की बात है कि भारत में अबतक ऐसा कोई नेता नहीं हुआ जो किसानों के हितों को ईमानदारी से संसद के पटल पर रखा हो या फिर घोषित योजनाओं की विफलता पर चिन्ता जाहिर करता हो। किसानों के नाम पर बड़े बड़े नेता पैदा हुए सब के सब किसानों को ठगने का ही काम किया&lt;span class=""&gt;  है। इसलिए &lt;/span&gt;किसान जागरूक होकर एक समूह में खेती शुरू करें तो कई मुश्किलें बिल्कुल आसान हो जाएगी।  इसलिए मेरा मानना है की खेती को उन्नत बनाकर रोजगार पैदा करने की खास जरुरत है ।  अगर आप आधुनिक खेती और इससे संबंधित  रोज़गार के बारे में कोई जानकारी चाहते हैं तो हमें बताएं मैं आपकी हर सम्भव मदद करूँगा&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4527566775775163531-4058042806334751026?l=kisanbhai.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kisanbhai.blogspot.com/feeds/4058042806334751026/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4527566775775163531&amp;postID=4058042806334751026' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4527566775775163531/posts/default/4058042806334751026'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4527566775775163531/posts/default/4058042806334751026'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kisanbhai.blogspot.com/2008/08/blog-post_17.html' title='कृषि प्रधान देश'/><author><name>कृष्ण कुमार कन्हैया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16176386032162944448</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' 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